पंचकर्म आयुर्वेद का एक प्रमुख शरीर को शुद्ध करने वाला उपचार माना गया हैं। पंचकर्म का अर्थ हैं पाँच विभिन्न चिकित्साओं का संमिश्रण है। पंचकर्म शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ रोगों को जड़ से खत्म करने का कार्य भी करता हैं। इसलिए पंचकर्म को सर्वश्रेष्ठ और लोकप्रिय चिकित्सा माना जाता हैं।

आजकल हम जो खाते उसमे 90 % पद्धार्थो में केमिकल मिले हुए होते है, जो हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को ख़त्म कर देता है। क्योकि ये केमिकल हमारे शरीर में इकट्ठा हो जाता है और कालांतर में जाकर निश्चित हो जाता है। पंचकर्म, आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित एक विशेष चिकित्सा पद्धति है, जो दोषों को शरीर से बाहर निकाल कर रोगों को जड़ से समाप्त करती है। यह शरीर शोधन की प्रक्रिया है, जो स्वस्थ मनुष्य के लिए भी फायदेमंद होती है।

पंचकर्म की विधि: पंचकर्म तीन प्रकार से  होता हैं:

प्रधान कर्म:पंचकर्म में पांच कर्म होते है –
  1. वमन, 2. विरेचन, 3. आस्थापन वस्ति, 4. अनुवासन बस्ति, 5. नस्य
  • वमन (उल्टी): पंचकर्म का पहला कर्म वमन होता है। कफ प्रधान रोगों को वमन करने वाली औषधियां देकर वमन करवाकर ठीक किया जाता है।
  • विरेचन: पित्त दोष विरेचन औषधियों के द्वारा ठीक किया जाता है।
  • अनुवासन(तेल एनीमा): एनीमा औषधियों का काढ़ा व औषधि युक्त शुद्ध तेल से एनिमा लगाया जाता है। रोगी को औषधि युक्त एनीमा दिया जाता है।
  • रक्तमोक्षण: इसमें रक्त खराब हो जाने से होने वाले रोगों से मुक्ति के लिए रक्त को बाहर निकाला जाता है। लीच चिपका कर अषुद्ध रक्त बाहर निकालने की कोशिश की जाती है।
  • नश्य: इस चिकित्सा में नाक के छिद्रों से औषधि अंदर डालकर कंठ तथा सिर के दोषों को दूर किया जाता है।
पूर्व कर्म: स्नेहन / स्वेदन
  • स्नेहन- स्नेह शब्द का तात्पर्य शरीर को स्निग्ध करने से होता है। यह स्नेह क्रिया शरीर पर बाह्य रूप से तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का अभ्यंग (मालिश) करके भी किया जा सकता है तथा इन पदार्थों का मुख द्वारा प्रयोग भी की जा सकती है। कुछ रोगों की चिकित्सा में स्नेहन को प्रधान कर्म के रूप में भी किया जाता है। चार प्रमुख स्नेह: (घृत, मज्जा  वसा, तेल)
  • रोगी को सात दिनों तक शुद्ध घी या औषधयुक्त घी दिया जाता है। यह दोषों को शांत करता है। और पाचन-क्रिया को संतुलित करता है।
  • यह गैस्ट्रिक, अल्सर तथा आँत के अल्सर में लाभकारी होता है।
  • स्नेह कर्म के बाद स्वेद चिकित्सा से लसीका, रक्त, पेशी ऊतक, वसा ऊतक तथा अस्थि मज्जा में मौजूद दोष तरल होकर गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल (आमाशय) नली में वापस चले जाते हैं।
  • स्वेद चिकित्सा दोषों को तरल करने में मदद करता है। यह भाप द्वारा शरीर में पसीना लाने का काम करता है।
  • स्वेदन- स्वेदन का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिससे स्वेद अर्थात पसीना उत्पन्न होता है। कृत्रिम उपायों द्वारा शरीर में स्वेद उत्पन्न करने की क्रिया स्वेदन कहलाती है।

स्वेदन के भेद-

  • एकांग स्वेद- अंग विशेष का स्वेदन
  • सर्वांग स्वेद- संपूर्ण शरीर का स्वेदन
पश्चात कर्म: संसर्जन कर्म / रसायन / रोग का शमन
  • संसर्जन कर्म: पूर्वकर्म और प्रधान कर्म के बाद शरीर शुद्ध हो जाता है और वह शुद्धता बनाए रखने के लिए संसर्जन कर्म किया जाता है।
  • रसायन कर्म: इस कर्म में व्यक्ति के शारीर का कायाकल्प करने के लिए, व्यक्ति को प्रकृति रसायन का सेवन करवाया जाता है ।
  • शमन कर्म: इसमें रोगी के रोग का पूर्ण रूप से खत्म कर के उसे सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार कर देते हैं।

पंचकर्म चिकित्सा के लाभ

  • शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाए
  • शरीर की क्रियाओं का संतुलन पुन: लौटाए
  • इंद्रिया और मन शांत होता हैं
  • दीर्घायु प्राप्त होती है और बुढ़ापा देर से आता है
  • शरीर में रक्त संचार को बढ़ाता है
  • मानसिक तनाव दूर करता हैं।
  • वजन घट जाता हैं।
  • आर्थराइटिस, मधुमेह, गठिया, लकवा आदि रोगों में राहत मिलती है।

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